Monday, 19 August 2013

कुछ बात थी उसमे
 कुछ बात हैं भी उसमे 
जो मै सोचने पे मजबूर हो गया 
आज महसूस किया उसको खुद में 
तो दिल से निकल गए आसू मेरे 
 आँखों ने महज रास्ता दिखा दिया 
वो भीड़ में हैं  मगर तन्हा खड़ी  
वो ढूढ़ रही हैं जिसे यादो के सहारे 
वो अब ना इस दुनिया में कही हैं  
वो  जीती हैं आज भी मगर जिन्दा नहीं 
कभी हँसती थी खुशिया जिसके चहरे पे 
उसके चहरे से वो खिलखिलाती मुस्कान छीन गई 
क्या हक था उसे जो अपनों से उसे दूर कर गया 
हरा भरा संसार पल में चकनाचूर कर गया 
वो मुरझा सी गई हैं आज 
जो कभी फूलो सी बिखेरती खुशबू महकाती थी पुरे घर को   
आज वो सिसकियो के साथ कोने में बैठने को मजबूर हो गई 
ये कैसी लीला हैं मौला  तेरे इस  कुदरत  की 
ये मुझे जानने का तो हक नहीं 
पर एक दुवा हैं तुझसे  मेरे दोस्त के लिए 
की उसकी खोई मुस्कान ला दे अभी-2  ........... Dedicated to my friend 

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