Thursday, 8 August 2013

' जीवन का खेल "
हर जीवन अनिश्चिताओ का खेल हैं !
या सोचे तो बिना पहियों की रेल हैं 
ये मान के बैठ ना रे मानव तू !
की तेरे पहिये तिलिस्म(भाग्य) से जुड़ जायेंगे 
ये तो उच्च सोच और दृढ़ता से ही मिल पाएंगे !
इन पहियों की ताकत बनाये रखना तू 
सच्चे मन ,निरंतरता और धैर्य ही ये चल पाएंगे 
जिन पहियों ने ये बागडोर संभाल रखी हैं
सुख-दुःख के हर मौसम में सतत बढ़ने की ताकत समा रखी हैं
बढ़ने से याद आया की अभी इंजन की बात तो बाकी हैं
अगर घूल जाये इंजन में प्यार, जोश के संग
तो बज पड़ेगी सीटिया अंग में भंग के संग
बढ़ चलेगी ये रेल तेरी मुहाबब्त की पटरी पर
कुचल जाएगी ईष्या तेरी पहियों के निचे दबकर
खिलेगा फूल इस जहाँ में अनेको इस कदर
फ़िजाए महक जाएँगी इस रोशन जगत में .......... P.p 

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