मनरंग (Praveen Pandey)
इस ब्लॉग "मनरंग" का उददेश्य मेरे मन में उठे हुए असख्य कोंपले, जो मेरे शब्दों के माध्यम से कुछ कविताओ के रूप में , तो कुछ नई सोच के रूप में आपसे रूबरू कराते हुए आपके मानसपटल को तरो- ताजा और खुशनुमा बनाने की कोशिश करते रहना । आपका मेरे ब्लॉग से जुड़े रहने के लिए आभारी हूँ । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ! ………… :)
Sunday, 1 January 2017
Monday, 29 September 2014
ना जाने किस कदर हम हुए जा रहे हैं किसी के!
जब अंदाज-ए-बोल समझे जा रहे हों किसी के !!
ये जरिया,ये माहौल या यू जज्बातों का बढ़ जाना!!!
ये हालात बता रहें हैं कि प्यार हैं तुम्हे किसी से!!!!
==========
यू बिता कल, आने वाले कल के लिए!
ढल गया आज, कल सँवारने के लिए!!
ये सिलसिला भागता चला जा रहा हैं!!!
खो गया वक्त कही अपनी जिंदिगी पाने के लिए!!!!
जब अंदाज-ए-बोल समझे जा रहे हों किसी के !!
ये जरिया,ये माहौल या यू जज्बातों का बढ़ जाना!!!
ये हालात बता रहें हैं कि प्यार हैं तुम्हे किसी से!!!!
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यू बिता कल, आने वाले कल के लिए!
ढल गया आज, कल सँवारने के लिए!!
ये सिलसिला भागता चला जा रहा हैं!!!
खो गया वक्त कही अपनी जिंदिगी पाने के लिए!!!!
खुद को जलाया था जिसे रौशनी देने के लिए!
आज वही कहने लगा मुझे देख जलता हैं, यारों!!
=========
लब्ज़ अनेको थे ज़ेहन में सर उठाये!
पर मेरा पढ़ना वहाँ काम आ गया!!
==========
दफ़नाने गये थे गम की पोटली काँधे लेकर!
तरसता हुआ घर वापस आया आँखों पर जाले लेकर!!
===========
ये रात ,ये दिन ,ये चैनो अमन का खजाना!
कहाँ ये मिलते हैं यारो जरा हमें भी बताना !!
############
आज वही कहने लगा मुझे देख जलता हैं, यारों!!
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लब्ज़ अनेको थे ज़ेहन में सर उठाये!
पर मेरा पढ़ना वहाँ काम आ गया!!
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दफ़नाने गये थे गम की पोटली काँधे लेकर!
तरसता हुआ घर वापस आया आँखों पर जाले लेकर!!
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ये रात ,ये दिन ,ये चैनो अमन का खजाना!
कहाँ ये मिलते हैं यारो जरा हमें भी बताना !!
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Saturday, 21 June 2014
लम्बे अरसे बाद लिखी एक कविता
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"इनका यही अंत? "
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कसूर तेरी आखों का नहीं हैं
उसमें उठने वाले लहरों का हैं
कसूर लहरों का भी नहीं हैं
उसको बहाने वाले हवाओं का हैं
कसूर इन हवाओं का भी नहीं हैं
वो तो इसमें स्पंदित आशाओं का हैं
कसूर इन आशाओं का भी नहीं हैं
वो तो इसमें बसने वाली आत्मा का हैं
कसूर इस आत्मा का भी नहीं हैं
ये तो पञ्च तत्व मिश्रित इस काठ का हैं
कसूर इस काठ का भी नहीं हैं
इन पर लोगो की नज़रों के फ़ास का हैं
कसूर फ़ास का भी नहीं हैं
इनमें समाज के कई बेबुनियादी ढकोसलों का हाथ है
जिसमें शांत हो जाती हैं कई लहरें
मनो कभी उठी ही ना हो
सो जाते है अनेको अरमान
जैसे मुर्दे कफ़न में लपेटे दफ़न हो गए हो
कुछ ऐसी ही होती हैं जिंदगी 'उनकी'
जिसमे शरीर तो होता हैं
पर आत्मा वनवास को चली जाती हैं P.p
'''''''''''''''''''''''''''''' '''''''''''''''''''''''''''''' ''''''''''''''''''''''''
प्रवीण पाण्डेय — feeling deep
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"इनका यही अंत? "
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कसूर तेरी आखों का नहीं हैं
उसमें उठने वाले लहरों का हैं
कसूर लहरों का भी नहीं हैं
उसको बहाने वाले हवाओं का हैं
कसूर इन हवाओं का भी नहीं हैं
वो तो इसमें स्पंदित आशाओं का हैं
कसूर इन आशाओं का भी नहीं हैं
वो तो इसमें बसने वाली आत्मा का हैं
कसूर इस आत्मा का भी नहीं हैं
ये तो पञ्च तत्व मिश्रित इस काठ का हैं
कसूर इस काठ का भी नहीं हैं
इन पर लोगो की नज़रों के फ़ास का हैं
कसूर फ़ास का भी नहीं हैं
इनमें समाज के कई बेबुनियादी ढकोसलों का हाथ है
जिसमें शांत हो जाती हैं कई लहरें
मनो कभी उठी ही ना हो
सो जाते है अनेको अरमान
जैसे मुर्दे कफ़न में लपेटे दफ़न हो गए हो
कुछ ऐसी ही होती हैं जिंदगी 'उनकी'
जिसमे शरीर तो होता हैं
पर आत्मा वनवास को चली जाती हैं P.p
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प्रवीण पाण्डेय — feeling deep
Saturday, 29 March 2014
" समाधान या कन्या दान "
समलैंगिकता को लेकर सबकी अपनी -२ राय हैं। नए -२ तार्किक बिंदु उधेड़ , बुन का काम कर रही हैं , नए -२ खोजो के साथ इनोवेटिव उपस्थिति हर क्षेत्र में जरुरत बन गई हैं संसार इस युग को इनोवेटिव एरा कहे तो अतिश्योक्ति न होगी। पर इन दिनों बदलाव को लेकर एक नई ब्यार बह रही हैं। .... 'गे' समुदाय में सेक्स एक इनोवेटिव विचार आया हैं जिसे हम अप्रकीर्तिक सेक्स समझते हैं …… हमारे पूर्वजों ने ये कभी नहीं सोचा होगा की ये इस तरह के रिश्ते भी पनप सकते हैं और उसमे ऐसा भी इनोवेटिव विचार आ सकता है। .... बहरहाल "परिवर्त्तन ही संसार का नियम हैं " इसपे काबिज़ होकर आगे बढ़ते। । गे समुदाय को मिली राहत को साढ़े चार साल ही बीते थे की हमारे समुदाये के प्रमुख जातियो के अनुवाइयो (हिंदू, मुस्लिम , इसाई) ने 'गे' समुदाय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। .......... इससे ये पता चलता हैं कि हिन्दू , मुस्लिम ,ईसाई में एकता हो सकती हैं … और दिसम्बर २०१३ में इस सम्बन्ध को गैर-संवैधानिक मानते हुए अप्रकीर्तिक सेक्स को भारतीय दंड संहिता में दोषी करार दिया …। वैसे बात करे अगर धरा ३७७ की तो इसमें कई लूपहोल हैं पहले तो हैं कि लेस्बियन पे ये लागू ही नहीं हो पायेगा
फिर दुबारा करीब ७६ तार्किक बिन्दुयों के साथ केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को पुनः विचार के लिए याचिका डाली हैं। केंद्र सरकार पहले से ही गे समुदाये के साथ खड़ी थी
अब देखना ये हैं कि इस याचिका पर उच्चतम न्यायालय विचार अडिग रहेगा या बदलाव की गुंजाईश हैं। …। ये तो आने वाला वक्त बतायेगा , पर अगर उच्चतम न्यायालय का फैसला बदल गया तो। … कितना हद तक हमारा समाज इस बदलवा को स्वीकार करेगा ये तो आने वाला वक्त बतायेगा। ............. प्रवीण पाण्डेय एक सोच, एक नजरिया !!!!
समलैंगिकता को लेकर सबकी अपनी -२ राय हैं। नए -२ तार्किक बिंदु उधेड़ , बुन का काम कर रही हैं , नए -२ खोजो के साथ इनोवेटिव उपस्थिति हर क्षेत्र में जरुरत बन गई हैं संसार इस युग को इनोवेटिव एरा कहे तो अतिश्योक्ति न होगी। पर इन दिनों बदलाव को लेकर एक नई ब्यार बह रही हैं। .... 'गे' समुदाय में सेक्स एक इनोवेटिव विचार आया हैं जिसे हम अप्रकीर्तिक सेक्स समझते हैं …… हमारे पूर्वजों ने ये कभी नहीं सोचा होगा की ये इस तरह के रिश्ते भी पनप सकते हैं और उसमे ऐसा भी इनोवेटिव विचार आ सकता है। .... बहरहाल "परिवर्त्तन ही संसार का नियम हैं " इसपे काबिज़ होकर आगे बढ़ते। । गे समुदाय को मिली राहत को साढ़े चार साल ही बीते थे की हमारे समुदाये के प्रमुख जातियो के अनुवाइयो (हिंदू, मुस्लिम , इसाई) ने 'गे' समुदाय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। .......... इससे ये पता चलता हैं कि हिन्दू , मुस्लिम ,ईसाई में एकता हो सकती हैं … और दिसम्बर २०१३ में इस सम्बन्ध को गैर-संवैधानिक मानते हुए अप्रकीर्तिक सेक्स को भारतीय दंड संहिता में दोषी करार दिया …। वैसे बात करे अगर धरा ३७७ की तो इसमें कई लूपहोल हैं पहले तो हैं कि लेस्बियन पे ये लागू ही नहीं हो पायेगा
फिर दुबारा करीब ७६ तार्किक बिन्दुयों के साथ केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को पुनः विचार के लिए याचिका डाली हैं। केंद्र सरकार पहले से ही गे समुदाये के साथ खड़ी थी
अब देखना ये हैं कि इस याचिका पर उच्चतम न्यायालय विचार अडिग रहेगा या बदलाव की गुंजाईश हैं। …। ये तो आने वाला वक्त बतायेगा , पर अगर उच्चतम न्यायालय का फैसला बदल गया तो। … कितना हद तक हमारा समाज इस बदलवा को स्वीकार करेगा ये तो आने वाला वक्त बतायेगा। ............. प्रवीण पाण्डेय एक सोच, एक नजरिया !!!!
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