Friday, 9 August 2013

"सोचती औरत "
ये कदाचित अतिश्योक्ति न होगी कि कोई औरत जज्बातों से घिरी न हो 
वो चोटिया बनाती सोचती जाती
क्या इसी दिन के लिए पैदा होती हैं हम 
हमारे आरजू, हमारी तम्मनाओ का बसेरा हैं कही 
या यू कहे हमारी औकात ही नहीं कही 
न चाहते हुए ये चुभती हैं रात के अँधेरे में दुबके हुए सबेरे कि तरह 
आस अब भी लिए हैं सपनो की रेत पर आशियानों जैसा 
बंद मुठ्ठियो में हैं दफ़्न न जाने कबसे अरमानो की जो असख्य कोपले
खोलना हैं उन मुठ्ठियों को ,लेना हैं सांसे खुद के लिए
अब बस जागना होगा हमें
चीरना होगा अँधेरे को रौशनी कि तरह
तैरना चाहते हैं हम भी आसमानों में पक्षियों के संग
जानना हैं आजादी के भाव उनके ढंग से
उठाना हैं चक्षुओ से पर्दा उनके
जो सोचते हैं औरतों का तो एक ही हैं काम बस
उन्हें दिखा देंगे हम
की अगर तोड़ दे इन घुघटो से लेकर बुर्को तक के बन्धनों को
कर देगी हर वो काम जो सोचते हैं लोग करने को
पर ये सब हो पायेगा कभी
या चोटियों में गुथ जायेगा मेरे अरमानो के ये सिलसिले ........ ये सोचती औरत .............

आज शाम कुछ अनछुए पहलु ने लिखने पे मजबूर कर दिया , कैसा लगा अपने विचार रखियगा
p.p 

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