Monday, 19 August 2013

इस  कविता में मैंने वृद्धा आश्रम में रह रहे लोगो को विभिन्न शब्दों के  रूप में स्थापित किया  हैं 
और कोशिश की हैं उस पल को आपसे मिलाने की,  सुक्रिया। ………… :)

    "बिखरे शब्द "
अनेकों बार दिखते थे 
आते जाते लडखडाये दरवाजे से  
कमरे में पड़े वो बिखरे शब्दों के मंजर 
खंडहर सी हो चली थी 
कुछ टूटे, कुछ फूटे पर गहरइयो में डूबे  
समेटना मुश्किल था भावों के जोड़ने के संग 
टिके थे कुछ शब्द दीवार से वोटे लगाये 
मनो बया कर रहे  हो कोई सहारे का कलम बन मुझको खड़ा कर जाये 
कुछ और भी थे जो बिल बिलाए से 
रुआसे हुए झुर्रियों लिए 
शायद बता रहे हैं   मलाल अब भी, न चुने जाने का किसी कविता के घरौदे में 
कुछ शब्दों ने तो अपने अस्तित्व खो डाले हैं 
और खो गये  किसी अनजान जहाँ में 
कुछ थे बैठे ब्रेन्चो  पे पैर हिलाए गुनगुना रहे थे 
लगा जैसे खुशियों से भरे शब्दों में उन्हें बार-२ पढ़ रहा हैं कोई   
कुछ मग्न थे छत की दीवारों में आँखों में खोई हुई विसमिर्तियो संग
ऐसे अनेको थे 
जिसमे से कुछ ने मेरी रूहों को छू लिया 
और बंध गया  मेरे कविता के बंधन में 
पर जोखिम भरा था मेरे लिए इस पल को समेट पाना 
और इस  ब्लैक & वाइट का लिहाफ  इस रंगीन दुनिया पे चड़ा पाना  ......... :) 

कुछ बात थी उसमे
 कुछ बात हैं भी उसमे 
जो मै सोचने पे मजबूर हो गया 
आज महसूस किया उसको खुद में 
तो दिल से निकल गए आसू मेरे 
 आँखों ने महज रास्ता दिखा दिया 
वो भीड़ में हैं  मगर तन्हा खड़ी  
वो ढूढ़ रही हैं जिसे यादो के सहारे 
वो अब ना इस दुनिया में कही हैं  
वो  जीती हैं आज भी मगर जिन्दा नहीं 
कभी हँसती थी खुशिया जिसके चहरे पे 
उसके चहरे से वो खिलखिलाती मुस्कान छीन गई 
क्या हक था उसे जो अपनों से उसे दूर कर गया 
हरा भरा संसार पल में चकनाचूर कर गया 
वो मुरझा सी गई हैं आज 
जो कभी फूलो सी बिखेरती खुशबू महकाती थी पुरे घर को   
आज वो सिसकियो के साथ कोने में बैठने को मजबूर हो गई 
ये कैसी लीला हैं मौला  तेरे इस  कुदरत  की 
ये मुझे जानने का तो हक नहीं 
पर एक दुवा हैं तुझसे  मेरे दोस्त के लिए 
की उसकी खोई मुस्कान ला दे अभी-2  ........... Dedicated to my friend 

Sunday, 11 August 2013

                   " माँ " 
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बेटा उठ जाओ स्कूल जाना हैं
कुछ इसी आवाज के साथ मेरे दिन की शुरुआत होती हैं
कितनी बार गूंजती ये मेरी कानो में
हर बार उठ जाती माँ के बोल के साथ
और लेट जाती माँ के बोल के अंत होने के साथ।
अगले ही पल गूंज उठी कानो में
अशोभती आवाजो की टनकार पापा की
और बोल गये ये शब्द "रिया उठो जल्दी अब "
ये शब्द सुन हो खड़ी हुई जैसे
मनो सोई ना थी कुछ देर पहले जैसे
मौसम में ठंडी का एहसास था
नहाने के लिए मौसम उदास था
न नहाने की सोची ही था
की पापा मुझे बाथरूम में ले खड़ा कर गये
उसके साथ उड़ेल दिए दो मग पानी से भरे
आ गई सिसकिया माँ के पुकार के साथ
आश थी मन में हर सिसकियो के साथ
माँ आ गई थी सुन आश मेरी
आते ही छिप गया मै उसकी गोद में आँचल के साथ
भूल बैठी सिसकियो को
नरम हथेलियों की गर्माहट संग
बिखेर दी मुस्कान चेहरे पे मेरे
अपने ममतामई ठिठोलियो संग
जान गयी थी आज माँ के उस रूप को
जो चर्चाओं में सुना करती थी कभी .............................. P.p 
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माँ,माँ होती हैं
माँ बच्चो के लिए दुआ होती हैं
माँ के ममतामई हिर्द्य का कोई जोड़ नहीं होता
इसलिए माँ के जगह का किसी में होड़ नहीं होता
 — feeling special.

Friday, 9 August 2013

कभी शख्स को अवोर्ड्स की जरुरत होती हैं और कभी अवोर्ड्स को शख्स की जरुरत होती हैं 
ये क्या ड्रामा हैं ...................... 
मुस्कराना एक दावा हैं जिसे जीवन भर लेना चाहिए ,सर्तिया लाभ होगा :        :D

किसी की नियत के बारे में सोचने से पहले अपनी नियत के बारे में सोचे दोनों का भला होगा !! 
कुछ पल के लिए ठहर जा ये समय के परिंदे , ये तो हमारे मिलन की घड़ी हैं !
रुक जा वही तू ,जी भर देख लेने दे, देखता नहीं , सामने मेरी महबूबा खड़ी हैं !! p .p 
 — 
घुट-२ के जी रहा था, अब तो घुटन का हिस्सा हू मै !
जो मेरे लिए सब कुछ थी ,अब उसके लिए मात्र किस्सा हू मै !!  p.p
कभी तन्हाइया, कभी उलझन , ना जाने कितने मोड़ हैं इस जिंदगी के इन गलियारों में। 
पर टूट के मुड़ना नहीं , बिखरना नहीं , झुकना नहीं, समझना जिंदगी के इस फ़साने को ।
पर रुक जाना नहीं, ये मुसाफिर, तुझे फानते जाना हैं , इन जिंदगी के चौतरफे दीवारों को।
समझ ले मुश्किलों को , जान ले मनसूबो को,डाल ले आदत इनकी , पर तुझे जीतना हैं इनसे , इनके बीच रहकर ।
तो दिखा दे इन्हें कि गर चाह ले तू , तो मीट जायेंगी हर मुश्किलें तेरे कदमो के नीछे धुल बनकर ।
ना रोक पाएंगी ये दीवारे तुझे शूल बनकर ,तू जीतता जायेगा हर मंजिल को एक वीर बनकर ।
चलेंगे लाखो कदम तेरे बनाये रास्तो पे , लोग गायेंगे गाथा तेरी,गीत भी गुनगुनाएगे सभी, तू हो जायेगा अमर सबकी यादो में भी।
करेगा राज तू ,सबके दिलो में ,एक योद्धा की तरह ,
(उकर जायेगा ये शख्सियत एक इतिहास बनकर )-२

कल ही लिखी ये कुछ पंक्तिया , विचार जरुर रखियेगा आप लोग
धन्यवाद आप लोगो का !!!!!
p.p :)
दिलो का आइना जब सच्चा होता हैं,तो हर मुस्कान अच्छा होता हैं !
कभी इन्हें आजमा कर तो देखिये , हर जगह खुशियों से भरा एक गुलदस्ता होता हैं !!
p.p :)
आज मेट्रो की यात्रा के दौरान ये कुछ पक्तिया मन में आ गया अच्छा लगे तो कमेंट दीजियेगा 
"मेट्रो में हमसफ़र "
मेट्रो के सफ़र में हमसफ़र ढूढ़ता हूँ !

हर स्टेशन को शीशे से नजर फेरता हूँ ,
कोई आता हैं कोई जाता हैं ,कोई दिल में शमा जाता हैं 
पर मै दिल पे रख के हाथ फिर आगे बढ़ जाता हूँ 
फिर सोचा मेट्रो में भी देख लेता हूँ ,नजरो से टटोल लेता हूँ 
कुछ बेरुखी थी ,कुछ शरमाई सी , कुछ पे मासुमियत भी छाई थी !
पर शायद अब भी ख्वाब अधूरे थे वो अब भी न मुझे मिल पाई थी ,
इस जोश के साथ बढ़ता जा रहा हूँ और मेट्रो का सफ़र, हमसफ़र की तलाश में करता जा रहा हूँ ...... 
p.p
सिले हुए होठ हो तो, ये जिह्वा भी काम नहीं करती !
तड़प हो किसी के दिल में तो कमबख्त शाम भी नहीं ढलती !!
p.p 
कभी लगता हैं चहक उठू कुछ किलकारियों भरी मुस्कान लिए ,और खो जाऊ उन बचपन के कुछ यादों के साथ!!
छोड़ जाऊ जो भागती हैं दुनिया सिर्फ दौलत के लिए , और खो जाऊ माँ की गोद में आँचल के साथ!! :)
"सोचती औरत "
ये कदाचित अतिश्योक्ति न होगी कि कोई औरत जज्बातों से घिरी न हो 
वो चोटिया बनाती सोचती जाती
क्या इसी दिन के लिए पैदा होती हैं हम 
हमारे आरजू, हमारी तम्मनाओ का बसेरा हैं कही 
या यू कहे हमारी औकात ही नहीं कही 
न चाहते हुए ये चुभती हैं रात के अँधेरे में दुबके हुए सबेरे कि तरह 
आस अब भी लिए हैं सपनो की रेत पर आशियानों जैसा 
बंद मुठ्ठियो में हैं दफ़्न न जाने कबसे अरमानो की जो असख्य कोपले
खोलना हैं उन मुठ्ठियों को ,लेना हैं सांसे खुद के लिए
अब बस जागना होगा हमें
चीरना होगा अँधेरे को रौशनी कि तरह
तैरना चाहते हैं हम भी आसमानों में पक्षियों के संग
जानना हैं आजादी के भाव उनके ढंग से
उठाना हैं चक्षुओ से पर्दा उनके
जो सोचते हैं औरतों का तो एक ही हैं काम बस
उन्हें दिखा देंगे हम
की अगर तोड़ दे इन घुघटो से लेकर बुर्को तक के बन्धनों को
कर देगी हर वो काम जो सोचते हैं लोग करने को
पर ये सब हो पायेगा कभी
या चोटियों में गुथ जायेगा मेरे अरमानो के ये सिलसिले ........ ये सोचती औरत .............

आज शाम कुछ अनछुए पहलु ने लिखने पे मजबूर कर दिया , कैसा लगा अपने विचार रखियगा
p.p 
सपने जितने देखने में पुरे होते हैं ,उतने ही अधूरे होते हैं !
इसे जज्बे के कैनवास पे ईमानदारी से उकेरो ,क्योकि emotions की नैया में ढ़ोने से ये कभी पुरे नहीं होते हैं !! p.p 
Do you really think that the Indian cinema can show the sexuality presence in better artistic style instead of current sexuality seen in cinemas .....?
ज़िन्दगी जीने का नाम हैं !
मरना तो बुझदिलो का काम हैं !!
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बुझदिलो के लिए ये ज़िन्दगी बड़ी मज़बूरी होती हैं!
जिंदादिल लोगो के लिए ये जिन्दगी अधूरी होती हैं !! p.p 
लोगो को जिन्दगी का मकसद मिल जाये तो, जज्बों में ग्लूकोस घुल जाता हैं !
अगर बिना मकसद के जिन्दगी हो जाये तो ,हवा निकले टायर का ट्यूब बन जाता हैं!! p.p 
मत निकालो जनाजा अपने ख्वाबों का इस कदर , जो तुम्हारे सोच की निशानी हैं! 
मत देख डगर पे इन काँटों से सजी बस्तियों को, जो तेरे आने वाले जलवे की कहानी हैं !! p.p :)
बदलावों का पदार्पण हमारे समाज को कुछ अच्छे और कुछ बुरे परिस्थितिया से अवगत कराता हैं ,जिसका हमारी सोच और रहन-सहन पे सीधा असर पड़ता हैं । इन दिनों हमारे भारतीय समाज में लडकियों के प्रति जो नजरिया उदीप्त हुआ हैं इससे अपने समाज की जितनी आलोचना की जाये कम हैं , 
कुछ लोग अपने मस्तिस्क विकारो के कारण लड़कियों के छोटे कपड़ो को नंग्नता और खुलेपन की दृष्टी से देख रहे हैं , क्योकि उनका कुढा हुआ मस्तिस्क स्त्रियों को बुर्के या साड़ियो में ढके हुए पुतले की तरह ही समझना चाहता हैं ।
ऐसे विकृत मस्तिस्क का भविष्य में बढ़ने से रोकने के लिए कुछ समुचित कदम उठाने जरुर चाहिए, अगर हम इसकी शुरुआत स्कुलो से करे,और इन्हें कुछ विषयों के माध्यम से समझाया जाये तो शर्तिया हमारे देश का उथान निश्चित हैं और ,तभी हमारे समाज से बलात्कार ,छेड़छाड़ और अनगिनत अपराध का अंत सम्भव हो सकता हैं ।
p.p  :)

Thursday, 8 August 2013

बड़ा ही मार्मिक चित्रण लगा हैं मुझे इसलिए पोस्ट कर दिया , जो आज के समाज पे बखूबी लागू होता हैं , दो लाइने ही लिख पाया पर दिल के गहरइयो से लिखा हैं| धन्यवाद !!
"माँ का दुलार और बेटे का अत्याचार "
कभी खुशियों का समुन्दर था समाया जहां , आज दुखो का मंजर छाया रहता है वहाँ !!
कभी न आने पाया दुखों का आँच जिस पर ,आज वही (बेटा ) छोड़ा हैं उन्हें(माँ ) आँच में वहाँ !! p.p
वो महफूज पाती थी खुद को 
जब उसके दरमियान होती थी कभी 
आज खुद को खौफजदा पाती हैं वो 
जब उसके दरमियान होती हैं कभी ......p.p :)
कभी उसके बोल से थम जाता था दर्द जहाँ
आज उसके बोल से पनपता हैं दर्द यहाँ(दिल में) ...... p.p :)
"जादू देखने के दौरान" 
परदे का तिलिस्म भी क्या खूब होता हैं !
उत्सुक निगाहों को जानने का भूख होता हैं !!
ये और बात हैं की दोनों का मिलन एक झूठ होता हैं !
पर ये तिलिस्म और निगाहों का संगम भी क्या अटूट होता हैं !! p.p 
Dedicated to all my lovely friends on celebration of friendship day ......................
मै अंजान था की वो क्या था
जो रिश्ता मुझसे जुड़ गया था 
बचपन के खेल-२ में 
जो मुझे आकर मिल गया था 
जाने वो क्या जज्बात था 
उस रिश्ते में क्या बात था
शायद वो रिश्ता मेरी लिए कुछ खास था......... 
वो पल जैसे खुशियों की दीवाली थी 
जहाँ मस्ती और भी मतवाली थी 
जब खिलती थी चहक एक दुसरे पर
तो हँसी मोतिया बन चेहरे पे खिल जाती थी
उस अनमोल पल को
करू तो करू कैसे बयां ,जनाब!
बस यू समझिये ,
हर चेहरा फूलो से सज़ा गुलदस्ता नज़र आता था। .....
इस रिश्ते की चमक बता रही थी
जो दिल में जगह बना रही थी
खुशबु जिसकी छा रही थी
शायद इसी रिश्ते को "दोस्ती" की पुकार आ रही थी -2
.......................................................... p.p 
' जीवन का खेल "
हर जीवन अनिश्चिताओ का खेल हैं !
या सोचे तो बिना पहियों की रेल हैं 
ये मान के बैठ ना रे मानव तू !
की तेरे पहिये तिलिस्म(भाग्य) से जुड़ जायेंगे 
ये तो उच्च सोच और दृढ़ता से ही मिल पाएंगे !
इन पहियों की ताकत बनाये रखना तू 
सच्चे मन ,निरंतरता और धैर्य ही ये चल पाएंगे 
जिन पहियों ने ये बागडोर संभाल रखी हैं
सुख-दुःख के हर मौसम में सतत बढ़ने की ताकत समा रखी हैं
बढ़ने से याद आया की अभी इंजन की बात तो बाकी हैं
अगर घूल जाये इंजन में प्यार, जोश के संग
तो बज पड़ेगी सीटिया अंग में भंग के संग
बढ़ चलेगी ये रेल तेरी मुहाबब्त की पटरी पर
कुचल जाएगी ईष्या तेरी पहियों के निचे दबकर
खिलेगा फूल इस जहाँ में अनेको इस कदर
फ़िजाए महक जाएँगी इस रोशन जगत में .......... P.p