Monday, 29 September 2014

खुद को जलाया था जिसे रौशनी देने के लिए!

आज वही कहने लगा मुझे देख जलता हैं, यारों!!

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लब्ज़ अनेको थे ज़ेहन में सर उठाये!

पर मेरा पढ़ना वहाँ काम आ गया!!


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दफ़नाने गये थे गम की पोटली काँधे लेकर!

तरसता हुआ घर वापस आया आँखों पर जाले लेकर!! 


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ये रात ,ये दिन ,ये चैनो अमन का खजाना!

कहाँ ये मिलते हैं यारो जरा हमें भी बताना !!


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