"कवि ,कविता और शब्द द्वंद "
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इस बार भी कुछ ऐसा हुआ
पिछले कविता जैसा हुआ
कविता के उत्थान के लिए
कवि कल्पनाओ में उड़ने लगा
आसन न था शब्दों का चूना जाना
और यथा स्थान पर कविता में पिरो पाना
जैसा पिरोया जाये कोई माला
विविधताओ भरे मोतियों संग
जा पंहुचा था आसमान की उचाईयों पर
जहाँ शब्द ,तारे बन चमचमा रहे थे
कुछ नीले ,कुछ पीले
पर सब रौशनी से नहा रहे थे
यह देख कवि मुस्कराने लगा
थोड़े तेज़ नजरो से शब्दों के चक्कर लगाने लगा
तभी एक शब्द ने एकाएक भाजी मारी
कह डाली न चुनने की ब्यथा स़ारी
पर चुनता कैसे कवि, शब्द ये उदास
पाठको से जो लेना था उसे वाह-वाही का ताज
शब्दों से द्वंद की टंकार आने लगी
पसर गया सन्नाटा जैसे काली रात छाने लगी हो
पर कविता के माहौल को चारचांद लगा रही थी
बन रही थी कविता जैसा वह चाह रहा था
द्वंद में टूटे शब्दों को भी कविता में सजा रहा था
जैसे कर गुजरते हैं नेता कुछ जनता संग
कुछ यही लहजा कवि भी अपना रहा था
शब्द चुनते हुए कुछ शब्दों को सहला भी रहा था
शायद चुनाव देखते हुए उसमे भी डिप्लोमेसी आ रहा था
कुछ इसी टूटे -फूटे अंदाज में शब्द चुनते गये
कविता के सृज़न में बुनते गये !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! P.p
Feeling Happy ..............
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